'सर्व ' की गरिमा ' स्व ' के अस्तित्व तक ही सीमित है l
जब 'स्व' ही नहीं तोह यह 'सर्व' का भाव भी शेष नहीं रहता l
सारा 'परम' फिर केवल एक कल्पना रह जाती है l
'स्व' का अविष्कार ही 'सर्व' है l
वास्तव कुछ और ही है l
जिसने जाना उसीने पहचाना ll
जब 'स्व' ही नहीं तोह यह 'सर्व' का भाव भी शेष नहीं रहता l
सारा 'परम' फिर केवल एक कल्पना रह जाती है l
'स्व' का अविष्कार ही 'सर्व' है l
वास्तव कुछ और ही है l
जिसने जाना उसीने पहचाना ll

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